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अक्षय तृतीया का महत्व

अक्षय तृतीया का महत्व

हिंदू शास्त्रों के अनुसार वैशाख शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहा गया है। अक्षय का अर्थ कभी भी क्षय ना होना    अर्थात  सदैव स्थायी रहना होता है। इस दिन किये गये  प्रत्येक पुण्य कार्यों में  जप, तप, पूजा, पाठ, यज्ञ, अनुष्ठान, होम, गंगा आदि के तीर्थस्नान, पितृतर्पण आदि सभी अक्षय होते है अर्थात थोड़ा सा किया हुआ कार्य भी नाश न होकर बहुत फलों को देने वाला होता है । ऐसा शास्त्रों में कहा गया है।
वैशाख शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि  (अक्षयतृतीया) को  त्रेता युग क आरम्भ होने से इस तिथि को त्रेता युगादि तिथि भी कहा जाता है। महर्षि वेदव्यास ने अक्षय तृतीया के दिन से ही महाभारत लिखना प्रारम्भ किया था। शास्त्रों के  अनुसार कहा जाता है कि आज के ही दिन  भगवान् विष्णु ने  परशुराम अवतार के रूप में जन्म लिया । भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। इस कारण भी अक्षय तृतीया को  परशुराम जयन्ति के रूप में भी मनाया जाता है।
भारत के  प्रसिद्ध चार धामों में से बद्रिनाथ के दरवाजे आज के तिथि से खुलने की परम्परा है ।
यवजाः सक्तवः शीता दीपना लघवः सराः।
कफ पित्तहराः रुक्षा लेखनाश्च प्रकीर्तिताः।।
ऋतुओं के  परिवर्तन के साथ- साथ  शरीर की कोशिकाएं एवं हमारे शरीर का तापमान भी परिवर्तन होता है जिस कारण कई बीमारियां होती है। इसलिए शास्त्रों मे जौ के सत्तू के सरबत पीने का भी उल्लेख है। जिससे की शरीर में कई फायदे जैसे कि शीतलता होने के साथ – साथ भूक और प्यास लगना, कफ और पित्त के रोग दूर करना, और पेट के वायुदोष को दूर करना, एवं बल, बुद्धि, पाचन शक्ति को बढ़ाने एवं सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करने का कार्य करता है।
अक्षय तृतीया का दिन एक सिद्ध मुहूर्त के रूप में मनाया जाता है और विभिन्न मांगलिक कार्य भी किये जाते है। इसमे भी रोहिणी नक्षत्र से  युक्त अक्षय तृतीया का विशेष महत्त्व होता है। देवता एवं पितृ के  उद्देश्य से जल से भरा हुआ  कलश, खड़ाव, गाय, अन्न, भूमि, खीरा, और  विभिन्न उपयोग करने वाली  वस्तुएँ विशेषतः  छाता, जुते- चप्पल, वस्त्र और जौ के सत्तू का सरबत आदि वस्तुओं का सुपात्र को दान करना चाहिए। इस प्रकार निम्न मंत्र का उच्चारण करके दान करना चाहिए।
एष धर्मघटो दत्तो ब्रह्मविष्णुशिवात्मकः । 
अस्य प्रदानात्तृप्यन्तु पितरोऽपि पितामहाः।। 
गन्धौदकं तिलैर्मिश्रं सान्नं कुम्भं फलान्वितम्। 
पितृभ्यः सम्प्रदास्यामि ह्यक्षयमुपतिष्ठतु ।।
इस दिन अक्षय फल प्राप्ति के लिए पितृ तर्पण के साथ -साथ जौ के सत्तू के सरबत का दान करने की परंपरा भी है।।
आज के दिन में किये गये  पुण्य कर्मों को  मध्याह्न से पहले सम्पन्न करना चाहिए। इस दिन दिया गया  दान, परोपकारी एवं मंगलमय फल युक्त सिद्ध होता है।

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